रस टाक्सिकोडेन्ड्रन (Rhus Toxicodendron)

परिचय-
रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि तन्तु-ऊतक को विशेष रूप से प्रभावित करती है, जिनमें संधियों (हडि्डयों के जोड़ों), पुट्ठों, आवरणों-कण्डराकलाओं आदि तन्तु-ऊतक प्रमुख हैं और इसके फलस्वरूप इन अंगों में दर्द और अकड़न उत्पन्न हो जाती है।
रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग वात और गठिया रोग से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग विशेषकर उन रोगियों पर किया जाता है जो अधिक भीगने के कारण या अधिक परिश्रम करने के कारण से उनका शरीर गर्म हो जाता है तथा भीगने या स्नान करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग लाभदायक है।
रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग चर्म रोगों, जोड़ों का दर्द, श्लेष्म कलाओं से सम्बन्धित रोगों तथा आंत्रिक-ज्वर से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए बहुत ही लाभकारी है।
रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है जो इस प्रकार है-ऐसा शल्योत्तर रोग (ऑपरेशन के कारण उत्पन्न विकार) जो बढ़ता रहता है और इसके साथ ही ऐसा दर्द होता है जैसे उस अंग को फाड़ा जा रहा हो। इस प्रकार के लक्षण के साथ ही जब रोगी गति करता है तो उसे आराम मिलता है।
रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग कई प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो इस प्रकार हैं- मोच आ जाने पर या बहुत भारी बोझ उठाने के कारण उत्पन्न रोग, पसीने आने की अवस्था में भीगने के कारण उत्पन्न रोग, शरीर के रक्त में खराबी होने के कारण उत्पन्न रोग, कोशिकाओं में सूजन और संक्रामक आग की तरह जलनयुक्त घाव की प्रारिम्भक अवस्थाएंं तथा ठण्डे मौसम में उत्पन्न होने वाले आमवात रोग।
इस औषधि का प्रयोग उन रोगियों पर किया जाता है जिनमें इस प्रकार के लक्षण होते हैं- हिलने-जुलने या गति करने से रोग के लक्षणों में कमी होती है और स्थिर रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
विभिन्न लक्षणों में रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी उदास रहता है और हर वक्त दु:खी रहता है, आत्महत्या करने की सोचता रहता है, अधिक बेचैनी होती है और इसके साथ ही लगातार स्थिति बदलते रहने का स्वभाव रहता है, रोगी कुछ न कुछ बड़बड़ाता रहता है तथा चीखता और चिल्लाता रहता है और इसके साथ ही जहर खा लेने जैसा डर लगता है। दिमाग ठीक प्रकार से कार्य नहीं करता है, रात के समय में बहुत अधिक चिंता होती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी बिस्तर पर ठीक प्रकार से लेट नहीं पाता है और उसे बेचैनी होती रहती है। घबराहट होने पर रोने का मन करता है। खुली हवा में घुमने से कुछ आराम मिलता है। मानसिक कमजोरी बहुत अधिक हो जाती है। दिमागी कार्य करने का मन नहीं करता है। आत्महत्या करने की इच्छा होती है लेकिन आत्महत्या करने का साहस नहीं होता। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि उपयोग लाभदायक है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे उसने अपने माथे पर पट्टी बांध रखी हो, उठते समय चक्कर आता रहता है, सिर में भारीपन महसूस होता है, मस्तिष्क ढीला-ढाला प्रतीत होता है और चलते या उठते समय ऐसा महसूस होता है कि कोई चीज खोपड़ी से टकरा रही है। खोपड़ी संवेदनशील हो जाती है जिसके कारण रोगी सिर के जिस भाग की तरफ लेटता है उसमें अधिक दर्द होता है। बिछौने से उठने या चलने या झुकने से चक्कर आने लगता है तथा लेटते समय रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। सिर के पीछे के भाग में भी दर्द होता है तथा दर्द वाले भाग को छूने पर और भी तेज दर्द होता है। माथे पर दर्द होता है जो वहां से पीछे की ओर बढ़ता है। खोपड़ी पर घाव-फुंसियां हो जाती है जो बुरी तरह से खुजलाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों के आस-पास के भागों में सूजन हो जाती है और सूजन वाले भाग लाल हो जाते हैं और चक्षुगन्हरीय कोशिका में सूजन हो जाती है। आंखों के भाग में जलन होती है। आंखों से बहुत अधिक पानी गिरता रहता है। पलकों में सूजन हो जाती है और उसमें जलन भी होती है और उसमें से पानी निकलता रहता है। पलकों में जलन होती है और पलके आपस में चिपक जाती हैं तथा उनमें सूजन आ जाती है। आंखों पर पुरानी चोट लगने के कारण रोग उत्पन्न हो। आंख के कनीनिका में खून जमने लगता है। कनीनिका में तेज घाव हो जाता है जिसमें जलन होती है। ठण्ड लगने के कारण, नमी के कारण और वात के कारण उत्पन्न आंखों में जलन वाले रोग। आंखों को घुमाने या दबाने पर दर्द होता है और आंखों को हिलाने में कठिनाई होती है तथा आंखों पर कई प्रकार के घाव हो जाते हैं और इसके साथ ही आंखों में जलन होती है। नाड़ियों में सूजन हो जाती है। पलकों को खोलने पर गर्माहट महसूस होती है तथा अधिक मात्रा में आंखों से पानी गिरता रहता है और ऐसा लगता है जैसे आंख झुलस गई हो। इस प्रकार के आंखों से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कानों में दर्द होता रहता है तथा इसके साथ ही ऐसा महसूस होता है कि उसके अंदर कुछ घुसा हुआ है और कानों में सूजन हो जाती है। कानों में से खून मिला हुआ पीब निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का सेवन करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को छींके आती रहती हैं और अधिक भींगने के कारण जुकाम हो जाता है। नाक की नोक लाल हो जाती है और उस पर दर्द होता रहता है और कभी-कभी नाक पर सूजन भी हो जाती है। झुकने पर नाक से खून निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चबाते समय जबड़ों में कड़कड़ाहट होने के साथ ही दर्द होता है। जबड़ों में अचानक दर्द होने लगता है तथा इसके साथ जबड़ों के पास की हडि्डयों में भी दर्द होता रहता है। चेहरे पर सूजन हो जाती है और उस पर घाव हो जाता है। गाल की हडि्डयों को छूने पर दर्द होता है। कान के आस-पास की ग्रंथियों पर सूजन हो जाती है और दर्द होता है। चेहरे के ऊपर की त्वचा पर दर्द होता है तथा सर्दी होने के कारण दर्द तेज हो जाता है, शाम के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मसूढ़ों-में-सूजन-तथा-घाव भी हो जाता है तथा इसके साथ ही रोगी के दांत ढीले और लम्बे महसूस होते हैं। जीभ लाल और फटी हुई महसूस होती है, जीभ की नोक त्रिकोणाकार हो जाती है तथा इसकी परत सूखी और किनारे पर लाल हो जाते हैं। मुंह के ठोढ़ी पर चारों ओर ज्वर होने जैसे छाले हो जाते हैं। मुंह के कोणों पर घाव हो जाता है। जबड़ें की हडि्डयों पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का सेवन करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले पर घाव हो जाता है तथा इसके साथ ही ग्रंथियों पर सूजन हो जाती है। किसी चीज को निगलते समय चुभने जैसा दर्द होता है, कानों के आस-पास की ग्रंथियों में सूजन हो जाती है और बायीं ओर की ग्रंथियों में अधिक सूजन हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- किसी भी चीज की भूख नहीं रहती है और साथ ही अधिक प्यास लगती है। मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है। जी मिचलाने लगता है और चक्कर आने लगता है और भोजन करने के बाद पेट फूलने लगता है। दूध पीने की इच्छा होती है। अधिक प्यास लगने के साथ ही मुंह तथा गले में खुश्की होती है। आमाशय में पत्थर के समान दबाव महसूस होता है। भोजन करने के बाद शरीर अधिक सुस्त हो जाता है तथा नींद सी छायी रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना लाभदायक है।
पसीने से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पसीना अधिक आता है तथा वह सो जाता है तब पसीना अधिक आता है, पसीना आने पर पित्त गायब हो जाते हैं। होंठों पर मोती की तरह छोटे-छोटे दाने उभर आते हैं। अधिक कमजोरी आ जाती है तथा खूनी दस्त भी आने लगते हैं तथा टाइफाइड रोग भी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में तेज दर्द होता है और पेट के बल लेटने से आराम मिलता है। छाती के आस-पास की ग्रंथियों में सूजन हो जाती है। आरोही वृहदांत्र प्रदेश में दर्द होता रहता है। पेट में दर्द होता है और दर्द इतना तेज होता है कि रोगी को झुकना पड़ता है। भोजन करने के बाद पेट फूलने लगता है। जागने पर पेट में हवा गड़गड़ाती है परन्तु लगातार गति करने से पेट फूलना बंद हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को दस्त लग जाता है और दस्त के समय में मलत्याग करने पर मल के साथ खून की कुछ मात्रा भी आने लगती है अर्थात रक्तातिसार हो जाता है और मल में लाल-लाल श्लेष्मा (कफ जैसा पदार्थ) निकलता है। रोगी को पेचिश हो जाता है तथा जांघों में होकर नीचे की ओर फाड़ता हुआ दर्द होता है। मल से शव जैसी बदबू आती है। मल झागदार आता है तथा मलत्याग करने पर दर्द नहीं होता है। इस प्रकार के मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब गंदा काला-काला और गाढ़े रंग का होता है और पेशाब कम मात्रा में होता है तथा इसके साथ ही पेशाब में सफेद रंग का तेल के समान पदार्थ आता है। पेशाब करने में परेशानी होती है और इसके साथ ही पेशाब के साथ खून की कुछ मात्रा आती है। इस प्रकार के मूत्र से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- पुरुष ग्रंथियों तथा शिश्न के पास की त्वचा पर सूजन होती है तथा गहरे लाल रंग की फुंसियां हो जाती है तथा अण्डकोष पर सूजन होने के साथ ही खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- योनि पर सूजन आने के साथ ही खुजली हो जाती है। चलने-फिरने पर छाती के पास के भाग में दर्द तथा अकड़न होती है। मासिकधर्म नियमित समय से पहले और अधिक मात्रा में आता है तथा स्राव चिर और जलन युक्त होता है। प्रसव होने के बाद स्त्री को बुखार हो जाता है तथा इसके साथ ही उसकी योनि से कुछ मात्रा में खून का स्राव होता है, स्राव पतला होता है और स्तन में दूध कम होता है और साथ ही योनि नली में ऊपर की ओर गोली लगने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि अधिक उपयोगी है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को परेशान करने वाली सूखी खांसी हो जाती है, आधी रात से सुबह तक, ठण्ड के समय में या सोने से हाथ को बाहर निकालते समय खांसी बहुत अधिक परेशान करती है। छाती के ऊपर सुरसुराहट होती है। कार्य करने की शक्ति से अधिक परिश्रम करने के कारण शरीर का खून नष्ट होने लगता है और खून चमकता हुआ लाल होता है। इंफ्लुएंजा रोग होने के साथ ही शरीर की सभी हडि्डयों में दर्द होना। अधिक बोलने के कारण मुंह से आवाज न निकलना। छाती में दबाव महसूस होती है और गड़ती हुई दर्द के कारण श्वास लेने में परेशानी होती है। वृद्ध व्यक्तियों को सांस लेने में परेशानी होती है तथा इसके साथ ही श्वास लेने वाली नलियों में जलन होती है तथा इसके कारण खांसी होती है जागने पर अधिक और कफ छोटी-छोटी गांठों के समान बलगम युक्त होती है। इस प्रकार के श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- कार्य करने की शक्ति से अधिक परिश्रम करने के कारण हृदय की कार्य करने की शक्ति का नष्ट हो जाना। नाड़ी तेज गति से चलना और कमजोर हो जाना तथा अनियमित गति से चलना तथा इसके साथ ही बायें बाजू में सुन्नपन हो जाना। शान्त बैठे रहने पर हृदय के पास कम्पन होना और हृदय की कार्य गति अनियमित होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- खाना खाते समय कंधों के बीच में दर्द होना, कमर में दर्द होना और अकड़न होना तथा गति करने से या किसी कठोर चीज पर लेटने से आराम मिलता है और बैठे रहने पर अधिक पीठ में दर्द होता है। गर्दन की हडि्डयों में अकड़न के साथ ही दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का सेवन करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई हडि्डयों के जोड़ों पर गर्माहट महसूस होती है तथा इसके साथ ही उस पर सूजन आ जाती है और दर्द भी होता है। कण्डराओं, पेशीबन्धों व प्रावरणियों में तेज फाड़ता हुआ दर्द होता है तथा इसके साथ ही हडि्डयों के जोड़ों में दर्द होता है, इस दर्द का असर गर्दन की हडि्डयों, नितम्बों और शरीर के बाहरी अंगों में फैल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब अपने हाथ-पैरों को चलाता है तो कुछ आराम मिलता है। हाथ-पैर कठोर हो जाती है तथा इसके साथ ही लकवा रोग जैसा प्रभाव भी देखने को मिलता है और ठण्डी तथा ताजी हवा सहन नहीं होती, इसके साथ ही त्वचा में दर्द होता है। अन्त:प्रकोश्टिका स्नायु में दर्द होता है। जांघों में फाड़ता हुआ दर्द होता है। ठण्ड के समय में, नए मौसम में और रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। अत्यधिक परिश्रम करने तथा ठण्ड लगने के बाद अंगों में सुन्नपन महसूस होता है तथा रेंगने पर और भी अधिक सुन्नपन महसूस होता है। कई अंगों में लकवा रोग जैसा प्रभाव देखने को मिलता है। घुटने के जोड़ों के आस-पास दर्द होता है तथा दौड़ने से भी तेज दर्द होता है। पैरों में सुरसुरी होती है तथा हाथ और उंगलियों की शक्ति कम हो जाती है और उंगलियों की नोकों में कुछ रेंगने जैसी अनुभूति होती है। इस प्रकार के शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार होने के साथ ही बेचैनी होती है, शरीर कांपने लगता है और जीभ सूखी व कत्थई रंग की हो जाती है, पागलपन जैसी स्थिति भी हो जाती है, दांतों पर मैल जमा रहता है, दस्त भी हो जाता है। बुखार लगने के साथ ही ठण्ड अधिक लगती है और सूखी खांसी भी हो जाती है और बेचैनी होती है। बुखार होने के साथ ही छपाकी रोग हो जाता है। चक्कर भी आता रहता है। ठण्ड के समय में रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे उसके शरीर पर ठण्डा पानी डाला जा रहा है और दोपहर के समय में बुखार लगने के साथ ही शरीर में अंगड़ाई होती है। हाथ-पैरों में वात रोग होने के कारण दर्द होता है और ऐंठन होती रहती है, दर्द आराम करते समय और भी तेज हो जाता है लेकिन हाथ-पैर चलाते समय दर्द कम होता है। रोगी के शरीर के कई अंगों में शक्ति कम हो जाती है और रोगी अंगों को ऊपर नहीं उठा पाता है। कमजोरी के कारण पैरों में दर्द होता रहता है और दर्द के कारण अपनी स्थिति बदलती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा लाल सूजी हुई हो जाती है तथा इसके साथ ही उस स्थान पर खुजली होती है। त्वचा पर दाद हो जाता है तथा इसके साथ ही छपाकी रोग हो जाता है और फोड़ें तथा फुंसियां हो जाती है जिसमें दूषित पानी भरा रहता है। ग्रंथियों में सूजन आ जाती है। कोशिकाओं में सूजन आ जाती है। त्वचा पर छाजन रोग हो जाता है और त्वचा पर पपड़ियां जम जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का सेवन करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को नींद में कार्य करने के सपने आते हैं और गहरी नींद आती है तथा इसके साथ ही ठण्ड भी लगती है। आधी रात से पहले नींद नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वात रोग से सम्बन्धित लक्षण :- कई प्रकार के वात रोग और गठिया रोगों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग किया जाता है। हडि्डयों, जोड़ों, पुट्ठों और नसों या कही भी ठण्ड लगने या भीगने या पसीने के एकाएक ही दब जाने से वात रोग उत्पन्न हो और गति करने से आराम मिलता हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
नींद के समय में, भीगे रहने पर, बरसाती मौसम में और वर्षा होने के बाद, रात के समय में, आराम करते समय, अच्छी तरह से भीगने पर, पीठ के बायीं या दायीं करवट लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
गर्म खुश्क मौसम में गति करने से, चलने से, स्थिति बदलते रहने से, गर्म सिंकाई करने से और अंगों को फैलाने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आर्निका, ब्रायो, नेट्रम-सल्फ, राडो ओर सल्फ औषधियों के कुछ गुणों की तुलना रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि से कर सकते हैं।
जिन सब नए रोगों में रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि उपयोगी होता है अधिकतर उन्ही रोंगों की पुरानी अवस्था में कैल्केरिया-कार्ब औषधि उपयोगी होती है।
पूरक:-
ब्रायो, कल्के-फ्लेरि, फाइटो (आमवात)। छपाकी में इसके बाद बोविस्टा दें।
विरोधी औषधि :-
एपिस औषधि के बाद और पहले रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
प्रतिकूल:-
एपिस।
प्रतिविष:-
दूध से धोने और ग्रिंडेलिया का घोल अत्यन्त प्रभावशाली होता है।
मात्रा (डोज) :-
रस टाक्सिकोडेन्ड्रन औषधि की 6 से 30 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इसके पौधे के मूलार्क की विषाक्तता के लिए इसी की 200 शक्ति और उच्चतर शक्तियां प्रतिविष हैं।

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